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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 24, Verses 21–24

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 24, verses 21–24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 24 · श्लोक 21-24

संस्कृत श्लोक

नासाद्यते ह्यनभ्यस्ता कांक्षतापि शठात्मना । पुत्र शालिरिवाव्युप्ता तस्मादेनां समाहर ॥ २१ ॥ तावद्भ्रमन्ति दुःखेषु संसारावटवासिनः । विरतिं विषयेष्वेते यावन्नायान्ति देहिनः ॥ २२ ॥ अभ्यासेन विना कश्चिन्नाप्नोति विषयारतिम् । अप्यत्यन्तबलो देही देशान्तरमिवागतिः ॥ २३ ॥ ध्येयत्यागमतोऽजस्रं ध्यायता देहधारिणा । भोगेष्वरतिरभ्यासाद्वृद्धिं नेया लता यथा ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

हे पुत्र, जैसे बोये बिना धान नहीं मिलते वैसे ही यदि विरक्ति का अभ्यास न किया जाय, तो भोगों में लुब्ध पुरुष कितना ही इसे क्यो न चाहे, पर यह नहीं मिलती, इसलिए इसको अभ्यास से स्थिर करो । संसाररूपी गर्त में निवास करनेवाले ये जीव तब तक विविध दुःखो मेँ भटकते हैं, जब तक विषयों में वैराग्य को प्राप्त नहीं होते । जैसे अत्यन्त बलवान देही भी गमन न करे तो अन्य देश को प्राप्त नहीं होता, वैसे ही अभ्यास के बिना कोई भी जीव जाहे वह कितना ही बलवान क्यों न हो, विषयों में विरक्ति को प्राप्त नहीं होता इसलिए निरन्तर पूर्वोक्त जीवन्मुक्ति के हेतु भी ध्येय वासना त्याग की अभिलाषा कर रहे देहधारी को अभ्यास से भोगों मे विरक्ति ऐसे बढानी चाहिए जैसे कि सेंक आदि से लता बढ़ाई जाती हे । अकस्मात (या एक साथ) सब विषयों का त्याग नहीं किया जा सकता; किन्तु क्रम से एक-एक विषय का चिरकाल तक त्याग कर पुनः कभी-कभी थोड़ा-थोड़ा सेवन करता हुआ पुरुष क्रम से वैराग्य की दृढ़ता होने पर सबका त्याग करे