Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 24, Verses 45–46
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 24, verses 45–46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 24 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
चित्तस्य भोगैर्द्वौ भागौ शास्त्रेणैकं प्रपूरयेत् ।
गुरुशुश्रूषया चैकमव्युत्पन्नस्य सत्क्रमे ॥ ४५ ॥
किंचिद्व्युत्पत्तियुक्तस्य भागं भोगैः प्रपूरयेत् ।
गुरुशुश्रूषया भागौ भागं शास्त्रार्थचिन्तया ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
चित्त के परिपाक के अनुसार भूमिका भेदों के कहने की इच्छावाले विरोचन पहली भूमिका कहते हैं ।
अव्युत्पन्न चित्त के सन्मार्ग के आरम्भ में दिन के दो भागों को एकमात्र देह के भोगोपायों से पूर्ण
करें, एक भाग को शास्त्र-श्रवण से पूर्ण करें और एक भाग को गुरु सेवा से पूर्ण करें