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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 24, Verses 26–29

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 24, verses 26–29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 24 · श्लोक 26-29

संस्कृत श्लोक

दैवमित्युच्यते लोके न दैवं देहवत्क्वचित् । अवश्यं भवितव्याख्या स्वेहया नियतिश्च या ॥ २६ ॥ उच्यते दैवशब्देन सा नरैरेव नेतरैः । यद्यस्येह यदा यत्र संपन्नं समतां गतम् ॥ २७ ॥ हर्षामर्षविनाशाय तद्दैवमिति कथ्यते । दैवं नियतिरूपं च पौरुषेणोपजीयते ॥ २८ ॥ सम्यग्ज्ञानविलासेन मृगतृष्णाभ्रमो यथा । यथा संकल्प्यते यद्यत्पौरुषेण तथैव तत् ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई कहे दैव से ही उसकी प्राप्ति क्यो न हो जायेगी ? तो इस पर कहते हैं। यद्यपि संसार में लोग दैव कहते हैं; तथापि दैव कोई देहधारी वस्तु नहीं है, किन्तु अवश्यभावितव्यतानामक जो नियति प्रयुक्त अपनी शुभाशुभ क्रिया है, वह मानुष दृष्टिवाले पुरुषों से ही दैव कही जाती है, न कि दिव्य शास्त्रीय दृष्टिवाले पुरुषों से; अतः देव भी पुरुषप्रयत्न ही है, उससे भिन्‍न नहीं है। शंका: प्रयत्न के बिना भी दैव से ही किन्‍्हीं को हर्ष और क्रोध की शान्ति दिखाई देती है, सो केसे ? समाधान : हर्ष और क्रोध के हेतुभूत कर्म का क्षय होने पर जब जहाँ जिसका जो ही हर्ष और क्रोध के विनाश के लिए सम्पन्न हुआ, वही यहाँ दैव शब्द से कहा जाता हे । जैसे मृगतृष्णाभ्रम मरुभूमि के तत्त्वज्ञान से जीता जाता है, वैसे ही नियतिरूप दैव वैराग्य दृढता अभ्यास आदिरूप पौरुष से थोड़े ही समय में जीता जाता है