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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 24, Verses 30–31

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 24, verses 30–31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 24 · श्लोक 30

संस्कृत श्लोक

फलवत्तागृहीतत्वे फलवत्तासुखप्रदम् । कर्ता नो मन एवेह यत्कल्पयति तत्तथा ॥ ३० ॥ नियतिं यादृशीमेतत्संकल्पयति सा तथा । नियतानियतान्कांश्चिदर्थाननियतानपि ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि दैवनामक नियति पौरुषनामक नियति से जीती जाती है, तो नियति के फल में नियम न होने के कारण अनियम हो जायेगा। ऐसा यदि कहो, ते इष्टापत्ति है, क्योकि मन के संकल्प से उत्पन्न सब पदार्थो में यदि कोई बाधक न हो, तो प्रमाणो से फलवत्ता गृहीत है, अतः मन:संकल्पजन्य पौरुष फलवत्तता द्वारा सुखप्रद है, ऐसा ही नियम माना गया है, ऐसा कहते हैं। जिस-जिस वस्तु का जैसे संकल्प किया जाता है, वह वैसे ही प्रमाणों से फलवत्ता के गृहीत होने पर पौरुष से फलवत्ता के द्वारा सुखप्रद होता है