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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 24, Verse 47

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 24, verse 47 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 24 · श्लोक 47

संस्कृत श्लोक

व्युत्पत्तिमनुयातस्य पूरयेच्चेतसोऽन्वहम् । द्वौ भागौ शास्त्रवैराग्यैर्द्वौ ध्यानगुरुपूजया ॥ ४७ ॥

हिन्दी अर्थ

प्रथम भूमिका पर विजय प्राप्त होने के अनन्तर उसके आगे की भूमिका कहते हैं। कुछ व्युत्पत्तियुक्त चित्त के सन्मार्ग के आरम्भ में दिन के एक भाग को भोगों से पूर्ण करें, दो भागों को गुरु सेवा में बितायें; क्योंकि अधिक समय तक गुरु के सान्निध्य में रहने पर समय-समय पर गुरुओं से अपना सन्देह होने पर पूछा जा सकता है और एक भाग को शास्त्रार्थ के चिन्तन में बितायें ॥ ४ ६॥ द्वितीय भूमिका पर विजय प्राप्त होने पर उसके आगे की भूमिका कहते हैं। व्युत्पत्ति को (रत्नतत््व के समान चिरकाल की परीक्षा से यथार्थ निश्चय को) प्राप्त हुए चित्त के सन्मार्ग के आरम्भ में दिन के दो भागों को शास्त्र और वैराग्य से और दो भागों को ध्यान और गुरु-पूजा से पूर्ण करना चाहिये