Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 24, Verse 42

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 24, verse 42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 24 · श्लोक 42

संस्कृत श्लोक

विरोचन उवाच । आत्मावलोकनलता फलिनी फलति स्फुटम् । जीवस्य भोगेष्वरतिं शरदीव महालता ॥ ४२ ॥

हिन्दी अर्थ

बलि ने कहा : हे सब असुरों के अधिपति, नित्यात्मभावरूप स्थिति देनेवाली भोगों में अरति ही जीव के अन्तःकरण मेँ कैसे स्थिर होती हे ?।४१॥ विरोचन ने कहा : हे पुत्र मोक्षरूप फलवाली आत्म-साक्षात्कार रूप लता भोगों में जीव की रति इस प्रकार स्पष्टरूप से पैदा करती है, जैसे कि अंगूर आदि की महालता शरद्‌ ऋतु में कच्चे फल पैदा करती है