Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 24, Verses 13–15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 24, verses 13–15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 24 · श्लोक 13-15
संस्कृत श्लोक
राजा तु तत्र भगवानात्मा सर्वपदातिगः ।
तेन मन्त्री कृतः प्राज्ञो मनो नाम महामते ॥ १३ ॥
मनोनिष्ठतया विश्वमिदं परिणतिं गतम् ।
घटत्वेनेव मृत्पिण्डो धूमोऽम्बुदतयैव च ॥ १४ ॥
तस्मिञ्जिते जितं सर्वं सर्वमासादितं भवेत् ।
दुर्जयं तद्विजानीयात्युक्त्यैव परिजीयते ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
हे महामते, वहाँ पर मनुष्य आदि के आनन्द से लेकर
हिरण्यगर्भ के आनन्दपर्यन्त सम्पूर्ण पदों का अतिक्रमण करनेवाले, वाणी ओर मन के अगोचर, भगवान
आत्मा ही राजा हैँ । उन्होने सब प्रज्ञाओं के समष्टिभूत मन को अपना मन्त्री बनाया । जैसे मिट्टी का
पिण्ड घटरूप से तथा धूम्र बादल के रूप से स्थूलता को प्राप्त होता है, वैसे ही यह विश्व वासनात्मक
सूक्ष्मभाव से मन में स्थित होकर ही स्थूलता को प्राप्त हुआ है । उस मन्त्री के विजित होने पर सब
जीतने के योग्य पदार्थ जीत लिए जाते हैं तथा सब प्राप्त करने के योग्य पदार्थ प्राप्त हो जाते हैँ । उसे
अत्यन्त दुर्जय जानना चाहिए, वह युक्ति से ही जीता जाता हे