Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 56
पचपनवाँ सर्ग समाप्त ॥ दाशूरोपाख्यान समाप्त ॥ छप्पनवाँ सर्ग॑ जड़ की सत्ता ओर असत्ता का तथा शुद्ध चेतन के कर्तृत्व, अकर्तृत्व का विचार कर दृश्य में तादात्म्य संसगध्यासरूप आस्था का सर्वथा निवारण |
33 verse-groups
- Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, यह जड जगत नहीं है, ऐसा निश्चय करके इसमें सब ओर…
- Verse 2दृश्य सत् है अथवा सदसत् है या असत् ही है, इन तीनों पक्षों में उसमें अहं, मम इत्यादि ता…
- Verse 3यह जगत सदसत् है, ऐसा यदि आपका निश्चय है, तो भी सत्ता और असत्ताके परस्पर नाशक होने के कार…
- Verse 4हे श्रीरामचन्द्रजी, यह जड जगत असत् है, ऐसा यदि आप मानते है, तो आपका बन्धन ही नहीं है | क…
- Verse 5इस जगत का कोई कर्ताहै अथवा यह अकर्तृहै अथवा कर्ताऔर अकर्ता साधारण यह उदासीन आत्मा की सन्न…
- Verse 6यह जगत-जाल कर्तारहित हो अथवा सकर्तृक हो, आप इससे अन्योन्य तादात्म्याध्यासवश एकत्व को (देह…
- Verses 7–8यदि कोई शंका करे, यतोवा इमानि भूतानि जायन्ते', “विश्वस्य कर्ता भवनस्य गोप्ता” इत्यादि श्र…
- Verse 9उसकी अनिर्वचनीयता को ही युक्ति से दिखलाते है। यह जगत न तो कभी अत्यन्त अभावरूप शून्यस्वभाव…
- Verse 10तब तो वह आत्मवत् सदा सत्स्वभाव अथवा क्षणिक सत्तास्वभाव हो ? इस पर कहते है । हे श्रीरामचन…
- Verses 11–12भले ही नियति से होनेवाली सृष्टि में परमात्मा की सन्निधिमात्र से कर्तृता हो पर यह मेरे सृष…
- Verse 13असीम काल का मनुष्य देह की परमावधिरूप सौ वर्ष कोई एक अंश है । पूर्व और उत्तर काल में कभी न…
- Verse 14जगत के पदार्थ यदि स्थिर है, तो स्थिर होने के कारण ही यानी त्याग और उपादान के लिए अयोग्य ह…
- Verse 15जगत के पदार्थ यदि अस्थिर हैं, तो भी उनमें आस्था करना शोभा नहीं देता, क्योकि अस्थिर पदार्थ…
- Verse 16हे महाबाहो श्रीरामचन्द्रजी, आत्मा की जगतस्वभावता यानी जन्म नाश आदि स्वभावता अन्योन्य तादा…
- Verse 17यदि कोई शंका करे कि सकर्तृकत्वपक्ष में इसके प्रति अनास्था कैसे हो सकती है ? इस पर कहते है…
- Verse 18जैसे सूर्य सब प्राणियों के दिवस कृत्य का निर्वाह करता हुआ भी कुछ नहीं करता वैसे ही परमात्…
- Verse 19यदि कोई शंका करे कि सूर्य सब प्राणियों के दिन कृत्य के निर्वाह में निमित्त मात्र है, दिन…
- Verses 20–21इस प्रकार विचार करने पर तो जगत में आस्था सुतरां उचित नहीं है, ऐसा कहते हैं । हे रामचन्द्र…
- Verse 22जैसे अकस्मात कहीं से आया हुआ अपरिचित प्राणी मैत्री का पात्र नहीं होता, वैसे ही भ्रम से उत…
- Verse 23असत्य होने से भी उसमें आस्था उचित नहीं हैं, ऐसा कहते हैं। जैसे शीत से पीड़ित हुए आपको उष्…
- Verse 24जैसे आप मनोरथ से कल्पित पुरुष को, स्वप्न में देखे गये मनुष्य को ओर द्विचन्दरत्वभरम को देख…
- Verses 25–27स्त्री आदि वस्तुओं से सौन्दर्य की चिन्तनमयी आस्था का अपने अन्दर अच्छी तरह परित्याग कर, अक…
- Verse 28जैसे मेघों के सन्निधानमात्र से कुटज के फूल अपने आप उत्पन्न होते हैं वैसे ही आत्मा की केवल…
- Verse 29जैसे सब प्रकार की इच्छा से रहित सूर्य के आकाश में रहने पर सब लौकिक व्यवहार होते हैं, वैसे…
- Verse 30जैसे रत्न को इच्छा नहीं रहती है कि मुझसे प्रकाश हो, किन्तु उसके रहने पर जैसे प्रकाश होता…
- Verse 31इसलिए आत्मा में कर्तृत्व और अकर्तृत्व भी स्थित है, क्योंकि इच्छा रहित होने के कारण वह अकर…
- Verse 32सन्मयपुरुष सम्पूर्ण इन्द्रियों से अतीत होने के कारण कर्ता ओर भोक्ता नहीं है ओर इन्द्रियों…
- Verse 33हे पापरहित श्रीरामचन्द्रजी, आत्मा में कर्तृत्व और अकर्तृत्व दोनों ही विद्यमान है, जिससे आ…
- Verse 34मैं सबमें स्थित ओर अकर्ता हूँ, इस दृढ भावना द्वारा प्रवाह से प्राप्त हुए कार्यो को करता ह…
- Verses 35–42चित्त की अप्रवृत्ति से जीव वैराग्य को प्राप्त होता हे । जिस पुरुष को “मे कुछ भी नहीं करता…
- Verse 43उक्त समता में स्थित हुआ चित्त फिर तनिक भी जन्म भागी नहीं होता। अथवा हे श्रीरामचन्द्रजी, आ…
- Verses 44–48इस दृष्टि की अपेक्षा पूर्वोक्त दृष्टियाँ स्वल्प महिमावाली है, ऐसा दशति है। यह (इस देह में…
- Verse 49अव उक्त तीनो दुष्टियो के इकट्ठा कर उनमें अपने अधिकार के अनुसार ऐच्छिक स्थिति की उपपत्ति क…