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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 56, Verse 49

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 56, verse 49 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 49

संस्कृत श्लोक

कर्ता नास्मि न चाहमस्मि स इति ज्ञात्वैवमन्तः स्फुटं । कर्ता चास्मि समग्रमस्मि तदिति ज्ञात्वाथवा निश्चयं । कोप्येवास्मि नकिंचिदेवमिति वा निर्णीय सर्वोत्तमे । तिष्ठ त्वं स्वपदे स्थिताःपदविदो यत्रोत्तमाः साधवः ॥ ४९ ॥

हिन्दी अर्थ

अव उक्त तीनो दुष्टियो के इकट्ठा कर उनमें अपने अधिकार के अनुसार ऐच्छिक स्थिति की उपपत्ति करते हुए सर्ग का उपसंहार करते हैं। मैं कर्ता नहीं हूँ, कर्तृता का प्रयोजक देहादि भी नहीं हूँ ', - ऐसा अपने हृदय में स्पष्ट जानकर अथवा 'सबका कर्ता मैं हूँ, सबका अधिष्ठानभूत ब्रह्माण्ड भी मैं ही हूः - यों निश्चय कर अथवा मैं यह प्रसिद्ध दृश्यरूप कुछ भी नहीं हू, किन्तु लोकप्रसिद्ध, परिच्छिन्न, जड़, दुःखस्वभाव संसार से विलक्षण पूणनिन्द चिदात्मा मैं हूँ, ऐसा निर्णय करके आप सर्वोत्तम अपने स्वरूप में स्थित होइये, जिसमें कि ब्रह्मवेत्ता साधु पुरुष स्थित हुए हैं