Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 56, Verses 44–48
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 56, verses 44–48 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 44-48
संस्कृत श्लोक
सर्वं त्यक्त्वा मनःपीत्वा योऽसि सोसि स्थिरो भव ।
अहं सोऽहमयं नाहं करोमीदमिदं तु न ॥ ४४ ॥
इति भावानुसंधानमयी दृष्टिर्न तुष्टये ।
सा कालसूत्रपदवी सा महावीचिवागुरा ॥ ४५ ॥
सासिपत्रवनश्रेणी या देहोऽहमिति स्थितिः ।
सा त्याज्या सर्वयत्नेन सर्वनाशेऽप्युपस्थिते ॥ ४६ ॥
स्प्रष्टव्या सा न भव्येन सश्वमांसेव पुष्कसी ।
तया सुदूरोज्झितया दृष्टौ पटललेखया ॥ ४७ ॥
उदेति परमा दृष्टिर्ज्योत्स्नेव विगताम्बुदा ।
ययाभ्युदितया राम तीर्यते भवसागरः ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
इस दृष्टि की अपेक्षा पूर्वोक्त दृष्टियाँ स्वल्प महिमावाली है, ऐसा दशति है।
यह (इस देह में प्रसिद्ध) मैं हूँ, इसे मैं करता हूँ और इसे नहीं करता ' - इस प्रकार के भावों का
अनुसन्धान करनेवाली दृष्टि सन्तोष के लिए नहीं होती ।
यदि वे सन्तोष के लिए नहीं है, तो क्यो आपने उनका उपन्यास किया ? ऐसी यदि शंका हो, तो
सम्पूर्ण अर्थों के मूल देह मे अहंभाव की निवृत्ति के उपाय रूप से उनका उपन्यास किया है, इस आशय
से देह में अहंभाव की अनर्थरूपता ओर सर्वथा हेयता को दशति है।
पूर्वोक्त दृष्टि कालसूत्र नरक की राह है, वही महावीचि नरकरूपी जाल है और असिपत्रवनों की
(एक प्रकार के नरकों की) परम्परा है, जो कि देह में "अहं" ऐसी प्रतीति हे । उसका प्रयत्नपूर्वक त्याग
करना चाहिये । यदि सर्वनाश भी उपस्थित होता हो तो भी भव्यपुरुषों को कुत्ते के मांस को ली हुई
चण्डालिन के समान उसका स्पर्श नहीं करना चाहिये, विशुद्धात्मदुष्टि के लिए पटलरूप नेत्र दोष की
परम्परा के समान आवरण ओर विक्षेप में हेतुभूत उस दृष्टि के दूर से त्याग कर देने पर बादलरहित
चाँदनी के समान परम निर्मल आत्मदुष्टि उदित होती है, हे श्रीरामचन्द्रजी, उदित हुई जिस दृष्टि से
भवसागर पार किया जाता हे