Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 56, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 56, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
न कदाचिदिदं चास्ति जगद्राम न च क्षयि ।
अजस्रं क्षीयमाणत्वान्नास्तित्वाच्चानुमानतः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
तब तो वह आत्मवत् सदा सत्स्वभाव अथवा क्षणिक सत्तास्वभाव हो ? इस पर कहते है ।
हे श्रीरामचन्द्रजी, यह जगत न कभी नित्यसत्तास्वभाव था और न क्षणिक सत्तास्वभाव था, क्योकि
प्रथम पक्ष यदि मानिए, तो प्रत्येक क्षण में परिणाम होने से इसके क्षणिकत्व का जो अनुभव होता है,
उसके साथ विरोध होगा | दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं क्योकि अनादि, अनन्त पूर्व ओर उत्तर काल में
असत् जगत् के वर्तमानरूप से अभिमत क्षण में भी असत् की सत्ता न होने के कारण असत्त्व का
अनुमान होता है