Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 56, Verse 28
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 56, verse 28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
अभ्रसंनिधिमात्रेण कुटजानि यथा स्वयम् ।
आत्मसंनिधिमात्रेण त्रिजगन्ति तथा स्वयम् ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे मेघों के सन्निधानमात्र से कुटज के फूल अपने आप उत्पन्न होते हैं वैसे ही
आत्मा की केवल सन्निधि से तीनों जगत स्वयं उत्पन्न होते हैं