Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 56, Verses 7–8
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 56, verses 7–8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 7,8
संस्कृत श्लोक
सर्वेन्द्रियविहीनात्मा कर्तेव स जडोपमः ।
अकर्तृ च तदा मन्ये काकतालीयवज्जगत् ॥ ७ ॥
काकतालीययोगेन जातं यत्किंचिदेव तत् ।
तस्मिन्भावानुसंधानं बालो बध्नाति नेतरः ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई शंका करे, यतोवा इमानि भूतानि जायन्ते', “विश्वस्य कर्ता भवनस्य गोप्ता” इत्यादि
श्रुतियों से विरुद्ध यह अकर्तृत्वपक्ष कैसे उठा ओर कैसे आपने इसका निरूपण किया ? इस पर
कहते हैं ।
त्तदद्रेश्यमग्राह्ममवर्णमचक्षु:श्रोत्रं तदपाणिपादं
नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तदव्ययं यद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति"
इत्यादि श्रुतियों से असंग उदासीन होने के कारण जड पर्वत आदि के तुल्य, सम्पूर्ण इन्द्रियो से
विहीन आत्मा मेरु सूर्य की परिधि करता है इसी तरह कर्ता की तरह जगन्मिथ्यात्वज्ञान के लिए उपहृत
होता है यानी लक्षणया कर्ता माना जाता है । इस तरह जब कर्तृत्वप्रतिपादक श्रुतियों का तत्त्व ज्ञात हो
गया तब जगत काकतालीय के समान अकर्तृक ही है, ऐसा मेरा विश्वास है । काकतालीय न्याय से
अनिर्वचनीय ही वह उत्पन्न हुआ हे । उसमें अहन्तादि के अभिमान से पुनः पुनः स्मृति मूर्ख को ही होती
है, अन्य को नहीं होती