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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 56, Verse 2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 56, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

दृश्यमानमथेदं चेदस्ति सत्तामुपागतम् । तिष्ठ स्वात्मनि बध्नासि त्वं किमत्र किलात्मत्ताम् ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

दृश्य सत्‌ है अथवा सदसत्‌ है या असत्‌ ही है, इन तीनों पक्षों में उसमें अहं, मम इत्यादि तादात्म्य संसगध्यास उचित नहीं है, ऐसा कहते है । ये देहादि आपकी सत्ता से निरपेक्ष सत्ता को प्राप्त होकर स्थित है, ऐसा यदि आप मानते हे, तो आप देहादि सत्ता से निरपेक्ष असंग उदासीन चिद्रूप स्वात्मा में स्थित होइये । आप निरपेक्ष देहादि में अध्यास द्वारा आत्मा को क्यों बोधते हे ? ? ऐसा करना तो आपके लिए उचित नहीं हे