Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 56, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 56, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
सर्वकर्ताप्यकर्तेव करोत्यात्मा न किंचन ।
तिष्ठत्येवमुदासीन आलोकं प्रति दीपवत् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई शंका करे कि सकर्तृकत्वपक्ष में इसके प्रति अनास्था कैसे हो सकती है ? इस पर
कहते हैं ।
यद्यपि आत्मा सर्वकर्ता है, तथापि वह अकर्ता के समान कुछ भी नहीं करता। जैसे दीपक आलोक
के प्रति उदासीन है वैसे ही आत्मा इस जगन्निर्माण के प्रति उदासीन रहता है