Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 56, Verse 5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 56, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
नेदं कर्तृकृतं किंचिन्न वा कर्तृकृतक्रमम् ।
स्वयमाभासते चेदं कर्त्रकर्तृपदं गतम् ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
इस जगत का कोई कर्ताहै अथवा यह अकर्तृहै अथवा कर्ताऔर अकर्ता साधारण यह उदासीन आत्मा
की सन्निधिमात्र से लभ्य है, तीनों पक्षों में आपकी उसके प्रति आस्था उचित नहीं है, ऐसा कहते है।
यह जगत कर्ता से निर्मित नहीं है और अकर्ता से किये गये क्रमवाला भी नहीं है, यह स्वयं ही कर्ता
और अकर्तारूपी पद को प्राप्त हुआ प्रतीत होता है