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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 56, Verse 23

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 56, verse 23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 23

संस्कृत श्लोक

औष्ण्येन्दौ शीतले भानौ मृगतृष्णाजले तथा । यथा न भावयस्यास्थामेवं भावय मा स्थितौ ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

असत्य होने से भी उसमें आस्था उचित नहीं हैं, ऐसा कहते हैं। जैसे शीत से पीड़ित हुए आपको उष्णता की भ्रान्ति से प्रतीत चन्द्रमा में आस्था नहीं होती, जैसे ताप से पीड़ित आपको भ्रान्तिवश शीतल प्रतीत हो रहे सूर्य में आस्था नहीं होती और जैसे प्यास से आकुल आपको मृग-जल में आस्था नहीं होती, वैसे ही जगत-स्थिति में भी आपको आस्था नहीं करनी चाहिए