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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 56, Verses 35–42

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 56, verses 35–42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 35-42

संस्कृत श्लोक

याति नीरसतां जन्तुरप्रवृत्तेश्च चेतसः । यस्याहं किंचिदेवेह न करोमीति निश्चयः ॥ ३५ ॥ भोगौघकामवांस्तत्र कः करोतु जहातु वा । तस्मान्नित्यमकर्ताहमिति भावनयेद्धया ॥ ३६ ॥ परमामृतनाम्नी सा समतैवावशिष्यते । अथ सर्वं करोमीति महाकर्तृतया तया ॥ ३७ ॥ यदीच्छसि स्थितिं राम तत्तामप्युत्तमां विदुः । अहो यन्न करोमीमं समग्रं जागतं भ्रमम् ॥ ३८ ॥ रागद्वेषक्रमस्तत्र कुतोऽन्यस्यात्यसंभवात् । यदन्येन शरीरं तु दग्धमन्येन लालितम् ॥ ३९ ॥ सोऽस्मदारम्भ एवातः कः खेदोल्लासयोः क्रमः । मत्सखासुखविस्तारे जगज्जालक्षयोदये ॥ ४० ॥ अहं कर्तेति मत्वान्तः कः खेदोल्लासयोः क्रमः । खेदोल्लासविलासेषु स्वात्मकर्तृतयैतया ॥ ४१ ॥ स्वयमेव लयं याते समतैवावशिष्यते । समता सर्वभूतेषु यासौ सत्या परा स्थितिः ॥ ४२ ॥

हिन्दी अर्थ

चित्त की अप्रवृत्ति से जीव वैराग्य को प्राप्त होता हे । जिस पुरुष को “मे कुछ भी नहीं करता हूँ” - ऐसा निश्चय है, वह भोग समूहों की कामनावाला होकर क्या कार्य करेगा अथवा क्या त्याग करेगा ? इसलिए नित्य मे अकर्ता हू, - इस प्रकार की दीप्त भावना से अमृतनामक वह परम समता ही अवशिष्ट रह जाती है । यदि उस महाकर्तृता से 'मैं ही सब कुछ करता हू - ऐसा यदि मानते हो, तो उस स्थिति को भी वृद्ध लोग उत्तम स्थिति कहते हैँ । प्रथम पक्ष में राग-द्रेष आदि की प्रसक्ति का अभाव दिखलाते है। “इस समस्त जगत्‌ भ्रम को मे नहीं करता हूँ ', - ऐसा यदि मानते हो, तो उस कल्प में अपने से अन्य का अत्यन्त अभाव होने के कारण राग-द्वेष का प्रसंग कहाँ है ? दूसरे पक्ष में भी रागद्वेष आदि की प्रसक्ति का अभाव दिखलाते है । अन्य ने जो शरीर को जलाया ओर अन्य ने जो पालन किया, वह भी हमारे द्वारा किया गया है, अतः उसमें खेद और हर्ष का कौन प्रसंग है ? मेरे सुख और दुःख का विस्तार करनेवाले जगज्जाल के नाश और अभ्युदय में मैं ही कर्ता हूँ, ऐसा हृदय में निश्चय करके स्थित हुए पुरुष के सुख और दुःख का कोन प्रसंग हे ? इस आत्मकर्तृता द्वारा दुःख और हर्ष के विलास के अपने-आप विलीन होने पर एकमात्र समता ही शेष रहती है । सब भूतो में समता है, वही सत्य परम स्थिति है