Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 22
इक्कीसवाँ सर्ग समाप्त बाईसवाँ सर्ग दृढ़ बोध हो जाने पर सब दोषों के विनाश, मन की प्रसन्नता ओर विशुद्ध आत्मतत्त्व के साक्षात्कार का वर्णन ।
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- Verses 1–8ज्ञान की फलभूत जीवन्मुक्तावस्था के अनुभव का प्रकार बतलाने के लिए श्रवण, मनन आदि के वृद्धि…
- Verse 9कामना आदि से छुटकारा पाता है, तदनन्तर अज्ञान से छुटकारा पाता हे
- Verse 10अज्ञान से विनिर्मुक्त मन की कैसी स्थिति होती है, उसे कहते है । संशयरूपी दुष्टता के शान्त…
- Verse 11जैसे वायु के शान्त होने पर समुद्र में समता (निश्चलता) उदित होती है, वैसे ही मन के शान्त ह…
- Verse 12जडता से जर्जरित स्वरूपवाली, अन्धकारमयी, बोधजनक वाक्य के व्यवहार से शून्य यह संसार की वासन…
- Verse 13चिद्रूपी आदित्य का दर्शन कर लेने पर गुरुसेवा, श्रवण, समाधि का अभ्यास आदिरूप पुण्यपल्लववाल…
- Verse 14सम्पूर्ण लोकों को आनन्दित करने में समर्थ, सत्त्वगुण की वृद्धि से प्राप्त हुई मनोहर प्रज्ञ…
- Verse 15अधिक कहने से क्या लाभ ? जिसने ज्ञातव्य परमात्मतत्त्व को जान लिया है, ऐसा महामति पुरुष वाय…
- Verse 16उसके महाप्रभाव का वर्णन करते है। जिसने विचार से स्वरूप का ज्ञान प्राप्त कर लिया है, जिसे…
- Verse 17प्रमादवश पहले की तरह पुनः प्राप्त विक्षेपप्रसक्ति का वारण करते है । आकारमात्र से प्रकट हो…
- Verses 18–19चित्त की वासना सेये लोक तरंगो की भाँति उत्पन्न होते हैं और नष्ट होते हैं, वे अज्ञ प्राणिय…
- Verse 20जैसे घट में घटाकाश न उत्पन्न होता है ओर न मरता है, वैसे ही इस संसार में शरीर के भूषित या…
- Verse 21भ्रमरूपी मरुस्थल मेँ उत्पन्न हुई मिथ्या संसारवासना शीतल विवेक का उदय होने पर चन्द्रमा के…
- Verse 22“भें कौन हूँ” “ये शरीरादि कैसे प्राप्त है" यह जव तक विचार नहीं किया गया, तभी तक यह अन्धका…
- Verse 23तो कैसी स्थिति से संसाररूपी अन्धकार से शून्य, पूर्ण आत्मा को पुरुष देखता है ? इस पर उस स्…
- Verse 24देशवश उत्पन्न जो आधिभौतिक, काल वश उत्पन्न जो आधिदैविक तथा शरीर में उत्पन्न जो आध्यात्मिक…
- Verse 25असीम जो आकाश, दिशा, काल आदि हैं ओर उनमें वर्तमान परिच्छिन्न उत्पत्ति, गति आदि क्रियाओं से…
- Verse 26करोड़ों अंशों मे विभक्त जो बाल के अग्रभाग का लाखवाँ भाग है, मैं उससे भी सूक्ष्म और व्यापक…
- Verse 27आत्मरूपसे प्रसिद्ध जीव तथा उससे दृश्य सकल पदार्थ चित्प्रसादमात्र है, इस तरह नित्य ऐक्यदृष…
- Verse 28यह अद्वितीय चित् सर्वशक्ति, अनन्तात्मरूप तथा सम्पूर्ण पदार्थो मेँ अन्तः स्थित है, इस तरह…
- Verse 29मनोव्यथा, दैहिक व्यथा और भय से उद्विग्न होनेवाला जरा, मरण और जन्म से युक्त देह मैं हूँ” ज…
- Verse 30मेरी महिमा तिरछे, ऊपर, नीचे सर्वत्र व्याप्त है, मुझसे अन्य कोई नहीं है, इस तरह जो देखता ह…
- Verse 31सूत में मणियों की भाँति सम्पूर्ण जगत मुझमें ही गुँथा है और चित्त भी मैं नहीं हूँ, इस तरह…
- Verse 32मैं ही हूँ" इस तरह जो देखता है, ऐसा करने पर चित् के परित्याग से अहंकार मात्र परिगृहित न…
- Verses 33–34जो भी कुछ यह त्रैलोक्य है, वह समुद्र में तरंग की भाँति मेरे ही अवयव है, इस तरह जो अपने अन…
- Verses 35–37स्वतः सत्ताशून्य होन से शोचनीय यह त्रिलोकी मुझसे ही अपनी सत्ता के प्रदान द्वारा पालनीय है…
- Verse 38है
- Verse 39यह जगत पूर्णरूप से तर्कं से अगम्य, वृत्तिके परिणाम से रहित यानी निर्विशेष सन्मात्र ही है,…
- Verse 40जो आकाश की भाँति एकात्मा है ओर सम्पूर्ण पदार्थो में व्याप्त होता हुआ भी उन भावों में अनुर…
- Verse 41सुषुप्ति, जाग्रत, स्वप्न इन अवस्थाओं से मुक्त, मृत्यु का भी परम आत्मीय यानी मृत्यु से भी…
- Verse 42सम्पूर्ण जगत में एक ब्रह्म ही है, इस बुद्धि से युक्त जिस पुरुषकी ब्रह्माकार दृष्टि संसार…