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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 22, Verse 23

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 22, verse 23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 23

संस्कृत श्लोक

मिथ्याभ्रमभरोद्भूतं शरीरं पदमापदाम् । आत्मभावनया नेदं यः पश्यति स पश्यति ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

तो कैसी स्थिति से संसाररूपी अन्धकार से शून्य, पूर्ण आत्मा को पुरुष देखता है ? इस पर उस स्थिति को कहते हैं। मिथ्या भ्रमसमूह से उत्पन्न, आपत्तियों के आश्रयभूत इस शरीर को जो आत्मभावना से “नेदं शरीरम्‌” (यह शरीर नहीं है) इस तरह बाधित देखता है, वह पूर्वोक्त पूर्ण आत्मा को देखता हे