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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 22, Verse 27

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 22, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 27

संस्कृत श्लोक

आत्मानमितरच्चैव दृष्ट्या नित्याविभिन्नया । सर्वं चिज्ज्योतिरेवेति यः पश्यति स पश्यति ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

आत्मरूपसे प्रसिद्ध जीव तथा उससे दृश्य सकल पदार्थ चित्प्रसादमात्र है, इस तरह नित्य ऐक्यदृष्टि से जो देखता है, वही पूर्वोक्त पूर्ण आत्मा को देखता है