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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 22, Verse 12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 22, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

अन्धकारमयी मूका जाड्यजर्जरितान्तरा । तनुत्वमेति संसारवासनेवोदये क्षपा ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

जडता से जर्जरित स्वरूपवाली, अन्धकारमयी, बोधजनक वाक्य के व्यवहार से शून्य यह संसार की वासना सूर्योदय होने पर रात्रि के तुल्य क्षीणता को प्राप्त होती है