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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 22, Verse 15

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 22, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 15

संस्कृत श्लोक

बहुनात्र किमुक्तेन ज्ञातज्ञेयो महामतिः । नोदेति नैव यात्यस्तमभूताकाशकोशवत् ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

अधिक कहने से क्या लाभ ? जिसने ज्ञातव्य परमात्मतत्त्व को जान लिया है, ऐसा महामति पुरुष वायु आदि चारों भूतं से रहित आकाश के तुल्य न तो उल्लास को प्राप्त होता हे ओर न अस्त होता हे