Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 22, Verses 18–19

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 22, verses 18–19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 18,19

संस्कृत श्लोक

तरङ्गवदिमे लोकाः प्रयान्त्यायान्ति चेतसः । क्रोडीकुर्वन्ति चाज्ञं ते न ज्ञं मरणजन्मनी ॥ १८ ॥ आविर्भावतिरोभावौ संसारो नेतरक्रमः । इति ताभ्यां समालोको रमते स निबध्यते ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

चित्त की वासना सेये लोक तरंगो की भाँति उत्पन्न होते हैं और नष्ट होते हैं, वे अज्ञ प्राणियों को ही अपनाते हैं न कि तत्त्वज्ञ को। मरण-जन्म यानी आविर्भाव-तिरोभावरूपी संसार तत्त्वज्ञ पर अपना असर नहीं डालता, यह जानकर तत्त्वज्ञानी इस आविर्भाव ओर तिरोभावो से माया से निर्मित व्याघ्रादि कौतुक के दर्शन के तुल्य रमण (क्रीडा) करते हैं ओर अज्ञानी उनसे बन्धन में पडते हें