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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 22, Verse 32

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 22, verse 32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 32

संस्कृत श्लोक

नाहं न चान्यदस्तीति ब्रह्मैवास्ति निरामयम् । इत्थं सदसतोर्मध्ये यः पश्यति स पश्यति ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

मैं ही हूँ" इस तरह जो देखता है, ऐसा करने पर चित्‌ के परित्याग से अहंकार मात्र परिगृहित न हो, इसलिए अहंकार के साथ जगत के निषेध से चिदेकरस ब्रह्म का ही परिशेषकर दर्शन करना चाहिये, यह कहते हैं। न मैं हूँ और न अन्य ही है, किन्तु एकमात्र निरामय ब्रह्म ही हैं, इस तरह व्यक्त तथा अव्यक्त पदार्थों के मध्य में जो देखता है, वही पूर्वोक्तपूर्ण आत्मा को देखता है