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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 22, Verses 35–37

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 22, verses 35–37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 35

संस्कृत श्लोक

आत्मतापरते त्वत्तामत्ते यस्य महात्मनः । भवादुपरते नूनं स पश्यति सुलोचनः ॥ ३५ ॥ चेत्यानुपातरहितं चिद्भैरवमयं वपुः । आपूरितजगज्जालं यः पश्यति स पश्यति ॥ ३६ ॥ सुखं दुःखं भवो भावो विवेककलनाश्च याः । अहमेवेति वा नूनं पश्यन्नपि न हीयते ॥ ३७ ॥

हिन्दी अर्थ

स्वतः सत्ताशून्य होन से शोचनीय यह त्रिलोकी मुझसे ही अपनी सत्ता के प्रदान द्वारा पालनीय है, यह मेरी छोटी बहन है, दृष्टिमात्र से पीड़ित होने के कारण अत्यन्त सुकुमार है, इस तरह जो देखता है, वही पूर्वोक्तपूर्ण आत्मा को देखता है ॥ ३ ४॥ आत्मता-परता, त्वत्ता-मत्ता ये जिस महात्मा के देहादि से निश्चितरूप से विवेक तथा बोध द्वारा निवृत्त हो गये, वही सुलोचन महापुरुष पूर्वोक्तपूर्ण आत्मा को देखता है