Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 22, Verse 40
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 22, verse 40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
य आकाशवदेकात्मा सर्वभावगतोऽपि सन् ।
न भावरञ्जनामेति स महात्मा महेश्वरः ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
जो आकाश की
भाँति एकात्मा है ओर सम्पूर्ण पदार्थो में व्याप्त होता हुआ भी उन भावों में अनुरक्त नहीं होता है, वह
महात्मा पुरुष निरतिशय स्वानन्द के उपभोग में समर्थ साक्षात शिव है