Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 15
चौढहर्वौ सर्ग समाप्त पन्द्रहवाँ सर्ग पूर्व शरीर को देखकर शुक्र का विलाप तथा विलाप मेँ हेतु विशेष कथनपूर्वक शरीर के स्वभाव का वर्णन ।
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- Verse 1श्रीवसिष्टजी ने कहा : इस प्रकार के तत्त्वज्ञानी, जिनके प्राण चंचल थे, संसार की गतिविधि का…
- Verses 2–3क्रमशः आकाश को आक्रान्त कर मेघच्छिद्रों से बाहर निकलकर वे सिद्धमार्ग से क्षणभर में मन्दरा…
- Verse 4शुक्र ने यह कहा : हे तात, वही यह कृश शरीर है, जिसका आपने सुखदायक भोगों से पहले लालन-पालन…
- Verses 5–10वह यह मेरा शरीर है, जिसके अवयवों मे स्नेहमयी धाई ने कपूर, अगरू, चन्दन आदि से बहुत दिनों त…
- Verses 11–13हे शरीर, तुम्हारा नाम शव पड़ गया है, सूर्य के सन्ताप से तुम शोषको प्राप्त हो गये हो ओर कग…
- Verse 14जिस पिघले हुए सुवर्णं के समान रमणीय मेरे शरीर से सुन्दर-सुन्दर अंगनाएँ काम से मोहित हुई थ…
- Verse 15ताप से जिसका चर्म सूख गया है एवं जिसका मुँह खुला है ऐसा मेरे कंकाल का विकृत मुख वन में मृ…
- Verse 16मेरे शव की उदररूपी गुहा सूख जाने के कारण भीतर प्रविष्ट हुई प्रकाशमान सूर्य की किरणों के स…
- Verse 17मेरा यह सूखा शरीर पर्वत की शिला पर चित पडा हे । यह अपनी तुच्छता से यानी विकृतरूप के प्रदर…
- Verse 18शब्द, रूप, रस, स्पर्श ओर गन्ध की अभिलाषा से रहित मेरा यह शरीर इतने समय तक मेरे परोक्ष में…
- Verse 19यह चित्तरूपी पिशाच से मुक्त हो गया हे, अतएव बड़े सुख के साथ स्वस्थ सा स्थित है। देवताओं स…
- Verse 20चित्तरूपी वेताल के शान्त होने पर शरीर को जो आनन्द प्राप्त होता है, वह सम्पूर्ण जगत के राज…
- Verse 21यह शरीर, जिसके सम्पूर्ण सन्देह नष्ट हो गए हैं और सब कौतुक जिससे चले गए हैं, कल्पनाओं का ज…
- Verses 22–23चित्तरूपी बन्दर की काम आदि चपलता से क्षुब्ध हुआ यह शरीररूपी वृक्ष जिस प्रकार अपने विवेक,…
- Verses 24–26सम्पूर्ण आशारूपी ज्वरों के कारणरूप मोहरूपी कुहरे के लिए शरदागमनरुप औचित्य के सिवा दूसरा श…
- Verses 27–28श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे भगवन्, आप सम्पूर्ण धर्मौ के तत्त्वों को जाननेवाले हैं, कृपया…
- Verse 29शुक्र के आधुनिक ब्रह्मपद में अधिकार के कारणभूत पूर्वकल्प में किये गये कर्म, जो कि पूर्व श…
- Verses 30–31प्रलयकाल में अवशिष्ट मायाशबलित ईश्वर से इस कल्प के सर्वप्रथम शरीररूप से जल में भिगोने से…
- Verse 32उस जन्म में उसके ब्राह्मण जन्मोचित गभाधान आदि सब संस्कार विधिपूर्वक किये गये थे, वहौँ पर…
- Verse 33चूँकि यह शरीर ब्रह्म से पूर्वोक्त रीति के अनुसार पहले-पहल इसी शुक्राचार्य के रूप में (=)…
- Verse 34यद्यपि शुक्राचार्य वीतराग थे, उन्हें किसी प्रकार की अभिलाषा भी न थी और समंगा नदी के तीर म…
- Verse 35चाहे ज्ञानी की देह हो चाहे अज्ञानी की देह हो, जब तक जीवन रहेगा सदा यह नियम चलेगा ही, इसमे…
- Verse 36अतएव अन्य व्यवहा में उनकी समानता ही है, ऐसा कहते है। जिन लोगों को तत्त्वज्ञान हो गया है औ…
- Verses 37–38लोकव्यवहार में अज्ञानी जैसा आचरण करता है, पूर्ण ज्ञानी भी ठीक वैसा आचरण करता हे । शंका: य…
- Verse 39जिसकी बुद्धि विषय पर आसक्त नहीं है, ऐसे विद्वान तत्त्वज्ञ पुरुष जब तक शरीर रहता है तब तक…
- Verse 40एक ही पुरुष का एक समय स्थिर ओर अस्थिर वृत्तियों के विरोध का निवारण करने के लिए दृष्टान्त…
- Verse 41जैसे प्रतिबिम्बो में स्थित सूर्य वस्तुतः स्वस्थ होता हुआ भी अस्वस्थ-सा, चंचल सा प्रतीत हो…
- Verse 42तब तो अज्ञ के समान विहित ओर निषिद्ध कर्मो से उसका भी बन्धन होगा, ऐसी आशंका करके ज्ञानेन्द…
- Verses 43–44लोक में सुख-दुःख दृष्टि ओर बन्धमोक्ष दृष्टि की हेतु ज्ञानेन्द्रिय ही हैँ, जैसे कि किरी वस…
- Verse 45सम्पूर्णं कर्मफलों की आसक्ति से रहित मन से आप कर्म कीजिये क्योकि कर्म देह की स्थिति है, स…
- Verses 46–48मानसिक दुःख, शारीरिक दुःख, जन्ममरणरूपी गर्तो से भरे हुए संसार के मार्गभूत तथा अत्यन्त सन्…
- Verse 49हे महात्मन्, सकल इच्छाओं की निवृत्ति करनेवाले, पूणनिन्दरूप, अविद्यादि दोषों से रहित पद क…