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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 15, Verse 29

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 15, verse 29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 29

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । शुक्रस्य कलना राम यासौ जीवदशां गता । कर्मात्मिका समुत्पन्ना भृगोर्भार्गवरूपिणी ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

शुक्र के आधुनिक ब्रह्मपद में अधिकार के कारणभूत पूर्वकल्प में किये गये कर्म, जो कि पूर्व शरीर से उत्क्रान्ति के समय इस कल्प में होनेवाले भ्ूगु द्वारा उत्पाद्य शरीराकार से परिणत हुए थे, भगु से उत्पाद्य शरीर की वासना से ही प्रलयो मे चिरकाल तक रहे थे, आकाश आदि के क्रम से इस कल्प में भूगु के शरीर की उत्पत्ति होने पर अन्न द्वारा उनके शरीर में प्रवेश कर वीर्यरूप मे परिणत होकर चिरकाल के अभ्यास से खूब दृढ़ हुए पूर्व जन्म के काम, कर्म वासनाओ के अनुसार ही शुक्राचार्य के शरीर की उत्पत्ति हुई थी। उस शरीर से कतिपय कर्मो के भोग होने पर भी अवश्य भोक्तव्य बहुत से प्रारब्ध कर्मो के शेष रहने से उसमें उनका स्नेहातिशय हुआ, अन्य देहों में नहीं हुआ, क्योकि अन्य देहो में भोगने योग्य कर्म शेष नहीं थे, इस आशय से वस्िष्ठजी उत्तर देते हैं। श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे वत्स श्रीरामचन्द्रजी, शुक्राचार्य की कमत्मिक जो यह वासना थी, वह जीवदशा को प्राप्त होकर भृगु से उत्पाद्य भार्गवरूप से उत्पन्न हुई