Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 15, Verses 5–10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 15, verses 5–10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 5-10
संस्कृत श्लोक
इयं सा मत्तनुर्यस्याः कर्पूरागुरुचन्दनैः ।
अङ्गमङ्गीकृतस्नेहा धात्री चिरमलेपयत् ॥ ५ ॥
इयं सा मत्तनुर्यस्या मन्दारकुसुमोत्करैः ।
रचिता शीतला शय्या मेरूपवनभूमिषु ॥ ६ ॥
इयं सा मत्तनुर्मत्तदेवस्त्रीगणलालिता ।
सरीसृपमुखक्षुण्णा पश्य शेते धरातले ॥ ७ ॥
चन्दनोद्यानखण्डेषु मम तन्वा ययानया ।
चिरं विलसितं सेयं शुष्ककङ्कालतां गता ॥ ८ ॥
सुराङ्गनाङ्गसंसर्गादुत्तुङ्गानङ्गभङ्गया ।
चेतोवृत्त्या रहितया तन्वाद्य मम शुष्यते ॥ ९ ॥
तेषु तेषु विलासेषु तासु तासु दशासु च ।
तथा तद्भावनाबन्धः कथं स्वस्थोऽसि देहक ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
वह यह मेरा शरीर है, जिसके अवयवों मे स्नेहमयी धाई ने कपूर, अगरू,
चन्दन आदि से बहुत दिनों तक लेप किया था । वह यह मेरा शरीर है, जिसके लिए मेरुपर्वत की उद्यान
भूमियो में मन्दार के पुष्पों से शीतल शय्या रची गई थी । देखिये, पहले मदोन्मत्त देवांगनाओं द्वारा
लालित मेरा यह शरीर है, जो इस समय साँप, बिच्छू आदि कीड़ों के डैंसने से छिद्रयुक्त होकर पृथिवी
पर गिरा हुआ है । मेरे जिस शरीर ने चन्दन के उद्यानों मेँ चिरकाल तक क्रीडा की थी, वही यह आज
शुष्क कंकालता को प्राप्त हो गया हे । अप्सरा के संसर्ग से तीव्र कामवेगवाली चित्तवृत्ति से रहित मेरा
शरीर आज सूख रहा है, उन-उन देवोद्यान आदि प्रदेशों में हुए विलासो में, उन-उन बाल्य, यौवन
आदि विचित्र अवस्थाओं में पूर्व अनुभूत तत्-तत् सौन्दर्य, अलंकार, गीत, हास्य आदि विलास आदि
भावनाओं के सम्बन्ध से युक्त होकर भी हे देह, आज तुम केसे स्वस्थ हो ! यानी तुम क्यों नहीं उसका
शोक करते हो