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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 15, Verses 43–44

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 15, verses 43–44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 43,44

संस्कृत श्लोक

सुखदुःखदृशो लोके बन्धमोक्षदृशस्तथा । हेतुर्बुद्धीन्द्रियाण्येव तेजांसीव प्रकाशने ॥ ४३ ॥ बहिर्लोकोचिताचारस्त्वन्तराचारवर्जितः । समो ह्यतीव तिष्ठ त्वं संशान्तसकलैषणः ॥ ४४ ॥

हिन्दी अर्थ

लोक में सुख-दुःख दृष्टि ओर बन्धमोक्ष दृष्टि की हेतु ज्ञानेन्द्रिय ही हैँ, जैसे कि किरी वस्तु के प्रकाशन में तेज हेतु है बाहर लोकोचित व्यवहारवाले ओर भीतर लोकोचित आचार से रहित, सम्पूर्ण इच्छाओं से शून्य ओर विषमता रहित होकर आप स्थित होईये