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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 15, Verses 46–48

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 15, verses 46–48 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 46-48

संस्कृत श्लोक

आधिव्याधिमहावर्तगर्तसंसारवर्त्मनि । ममतोग्रान्धकूपेऽस्मिन्मा पतातापदायिनि ॥ ४६ ॥ न त्वं भावेषु नो भावास्त्वयि तामरसेक्षण । शुद्धबुद्धस्वभावस्त्वमात्मान्तः सुस्थिरो भव ॥ ४७ ॥ त्वं ब्रह्म ह्यमलं शुद्धं त्वं सर्वात्मा च सर्वकृत् । सर्वं शान्तमजं विश्वं भावयन्वै सुखी भव ॥ ४८ ॥

हिन्दी अर्थ

मानसिक दुःख, शारीरिक दुःख, जन्ममरणरूपी गर्तो से भरे हुए संसार के मार्गभूत तथा अत्यन्त सन्ताप देनेवाले इस ममतारूपी भीषण अन्धकूप में आप मत गिरिये । न तो आप दृश्य वस्तु देहादि में विद्यमान हैं और न आप में ये देहादिभाव हैं हे कमलनयन, शुद्ध -बुद्ध स्वभाववाले आप अपने स्वरूप में स्थित होइये । आप निर्मल शुद्ध ब्रह्म है । आप सबका निर्माणकरनेवाले ओर सर्वात्मक है । सारा विश्व शान्त अज है, ऐसी भावना करते हुए आप सुखी होइये