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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 15, Verse 45

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 15, verse 45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 45

संस्कृत श्लोक

सर्वैषणाविमुक्तेन स्वात्मनात्मनि तिष्ठता । कुरु कर्माणि कार्याणि नूनं देहस्य संस्थितिः ॥ ४५ ॥

हिन्दी अर्थ

सम्पूर्णं कर्मफलों की आसक्ति से रहित मन से आप कर्म कीजिये क्योकि कर्म देह की स्थिति है, स्वभाव है। भगवान ने भी कहा हे : "नहि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः" अर्थात्‌ देहधारी कर्मो का निःशेष त्याग नहीं कर सकता हे