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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 15, Verse 42

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 15, verse 42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 42

संस्कृत श्लोक

मुक्तबुद्धीन्द्रियो मुक्तो बद्धकर्मेन्द्रियोऽपि हि । बद्धबुद्धीन्द्रियो बद्धो मुक्तकर्मेन्द्रियोऽपि हि ॥ ४२ ॥

हिन्दी अर्थ

तब तो अज्ञ के समान विहित ओर निषिद्ध कर्मो से उसका भी बन्धन होगा, ऐसी आशंका करके ज्ञानेन्द्रियों से आसक्तिपूर्वक किये गये कर्म ही बन्धक होते हैं, अन्य कर्म नहीं, इस आशय से कहते हैं । जिसकी ज्ञानेन्द्रियों ने संग छोड़ दिया है, उसकी कर्मेन्द्रियों के विषयों में आसक्त होने पर भी वह मुक्त है। यदि कर्मेन्द्रिय विषयो मेँ आसक्ति रहित हैं ओर ज्ञानेन्द्रिय विषयों के आधीन हैं, तो वह बद्ध हे