Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 15, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 15, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
मत्तनुः परिशुष्केयं स्थितोत्तानाचलोपले ।
वैराग्यं नयतीवात्मतुच्छत्वेनान्तरं सताम् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
मेरा यह सूखा शरीर पर्वत की शिला पर चित पडा हे । यह अपनी
तुच्छता से यानी विकृतरूप के प्रदर्शन से सज्जन पुरुषों के हृदय में वैराग्य का मानों उपदेश दे रहा
है