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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 15, Verses 37–38

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 15, verses 37–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

व्यवहारे यथैवाज्ञस्तथैवाखिलपण्डितः । वासनामात्रभेदोऽत्र कारणं बन्धमोक्षदम् ॥ ३७ ॥ यावच्छरीरं तावद्धि दुःखे दुःखं सुखे सुखम् । असंसक्तधियो धीरा दर्शयन्त्यप्रबुद्धवत् ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

लोकव्यवहार में अज्ञानी जैसा आचरण करता है, पूर्ण ज्ञानी भी ठीक वैसा आचरण करता हे । शंका: यदि लौकिक व्यवहार में ज्ञानी और अज्ञानी दोनों की तुल्यता ही है तो एक बन्धन में पड़ता है दूसरे को मुक्त मिलती है, यह अन्तर कैसे ? समाधान : उनको बन्ध-मोक्ष देने में एकमात्र कारण वासना का भेद है