Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 15, Verses 24–26

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 15, verses 24–26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 24-26

संस्कृत श्लोक

सर्वाशाज्वरसंमोहमिहिकाशरदागमम् । अचित्तत्वं विना नान्यच्छ्रेयः पश्यामि जन्तुषु ॥ २४ ॥ त एव सुखसंभोगसीमान्तं समुपागताः । महाधिया शान्तधियो ये याता विमनस्कताम् ॥ २५ ॥ सर्वदुःखदशामुक्तां संस्थितां विगतज्वराम् । दिष्ट्या पश्याम्यमननां वने तनुमिमामहम् ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

सम्पूर्ण आशारूपी ज्वरों के कारणरूप मोहरूपी कुहरे के लिए शरदागमनरुप औचित्य के सिवा दूसरा श्रेय प्राणियों में मैं नहीं देखता हूँ यानी चित्तभाव सम्पूर्ण आशारूपी ज्वरों के हेतुभूत मोह का नाश कर देता है, अतएव वही सबकी अपेक्षा श्रेष्ठ श्रेय है। वे ही ब्रह्मा के आनन्दपर्यन्त विषय सुखों की परमावधिरूप भूमानन्द को प्राप्त हुए हैं, जो शान्तबुद्धि पुरुष अपरिच्छिन्न ब्रह्मसाक्षात्काररूप महाबुद्धि से मनोनाश को प्राप्त हुए हैं मैँ अपने भाग्योदय से सब दुःखदशाओं से रहित और सन्तापशून्य इस शरीर को संकल्प-विकल्प से रहित जीवन्मुक्त के शरीर के तुल्य वन में देख रहा हूँ