Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 15, Verse 15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 15, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
पश्य मे विततास्येन तापसंशुष्ककृत्तिना ।
मत्कङ्कालकुवक्रेण वित्रास्यन्ते वने मृगाः ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
ताप से जिसका चर्म सूख गया है एवं जिसका मुँह खुला है ऐसा मेरे कंकाल का
विकृत मुख वन में मृगो को भयभीत कर रहा है