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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 15, Verses 22–23

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 15, verses 22–23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 22,23

संस्कृत श्लोक

चित्तमर्कटसंरम्भसंक्षुब्धः कायपादपः । तथा वेगेन चलति यथाऽऽमूलान्निकृन्तति ॥ २२ ॥ चित्तानर्थविमुक्तोऽद्रौ गजाभ्रहरिविग्रहम् । नाद्य पश्यति मे देहः परानन्द इव स्थितः ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

चित्तरूपी बन्दर की काम आदि चपलता से क्षुब्ध हुआ यह शरीररूपी वृक्ष जिस प्रकार अपने विवेक, सद्वासना आदि शाखा, पल्‍लवों का विनाश हो, वैसे वेग से नहीं चलता, किन्तु जैसे जड़ के साथ उखड़ जाय वैसे चलता है। भाव यह है कि जिन स्थावर आदि योनियों में विवेक का अधिकार नहीं है, उन्हीं योनियों में जीव को गिराता है। इस सुन्दर पर्वत में मेरा यह शरीर चित्तरूपी अनर्थ से मुक्त होकर आज गजघटाओं और सिंहों के गर्जन, तर्जन आदिरूप वैर को नहीं देखता, पहले कौतुक दर्शनरूप परमानन्द में स्थित हुआ सा यह जैसे बाहर के कौतुक दर्शन से प्रसन्न होता था वैसा आज नहीं होता (=)