Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 15, Verse 34
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 15, verse 34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
वीतरागोऽप्यनिच्छोऽपि समङ्गाविप्ररूपवान् ।
स शुशोच तनुं शुक्रः स्वभावो ह्येष देहजः ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
यद्यपि शुक्राचार्य
वीतराग थे, उन्हें किसी प्रकार की अभिलाषा भी न थी और समंगा नदी के तीर में तपस्या निरत ब्राह्मण
का रूप उन्होंने धारण कर रक्खा था फिर भी उन्होंने देह के लिए विलाप किया; क्योकि देह का ऐसा ही
स्वभाव है। भाव यह कि ज्ञानी भी प्रारब्ध कर्म का उल्लंघन नहीं कर सकते, उन्हें भी उसका भोग करना
ही पडता हे