Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 14
34 verse-groups
- Verse 1चौदहवाँ सर्ग समंगा नदी के किनारे पर जाकर काल और भृगु ऋषि का शुक्राचार्य को समाधि से जगाना…
- Verses 2–3पर्वत से उतर रहे उन दोनों महातेजस्वियों ने अभिनव, सुवर्णमयी लताओं के समूहों के निकुजों मे…
- Verse 4ऊँचे शिलाखण्डरूपी आसन पर बैठे हुए तथा लीला से तीनों जगतों को देखनेवाले सिद्धों को भी देखा…
- Verses 5–6जिनमें निरन्तर फूल गिर रहे थे, ऐसे धारा के प्रवाहों में, जो नहा चुके थे तथा ताल वृक्ष की…
- Verses 7–12एवं चंचल और मनोहर चमरो को देखा जो पर्वतराजके चँवर के तुल्य प्रतीत होते थे । जिनमें निरन्त…
- Verse 13इस तरह वे दोनों इधर-उधर बढी-चदढी पर्वत की शोभा को देखते हुए गाँव तथा शहरों से सुशोभित पृथ…
- Verse 14पृथिवी पर क्षणमात्रे फूलों से चंचल तरंगों से युक्त समंगा नदी पर पहुँचे मालूम होता था कि व…
- Verses 15–18वहाँ पहुँचने के अनन्तर समंगा नदी के किनारे कहीं पर भृगु ऋषि ने अपने पुत्र को देखा, उसने द…
- Verse 19वह एकान्त में अकेला स्थित था, शरीर कान्ति से अत्यन्त कमनीय था। उसकी सारी चेष्टाएँ शान्त ह…
- Verse 20वह निर्विकल्प समाधि में स्थित था, अतएव शीत-उष्ण आदि द्वन्द्व की वृत्तियों से शून्य था । म…
- Verse 21सम्पूर्ण प्रवृत्तियों उससे पृथक् हो गई थी, सम्पूर्ण कर्मफलों से वह शून्य था ओर उसने सम्प…
- Verse 22वह अनन्त सुखपूर्णं व्यापक आत्मतत्त्व मेँ विश्रान्त था अतएव प्रतिबिम्ब का ग्रहण नहीं कर रह…
- Verse 23“यह अग्राह्य है” तथा "यह ग्राह्य है" इस संकल्प-विकल्प से शून्य तथा आत्मबोध को प्राप्त हुए…
- Verse 24उस भृगु के पुत्र को देखकर काल ने भृगुजी से समुद्र के निर्घोष के तुल्य गम्भीर स्वर से कहा…
- Verse 25जैसे मेघ के गम्भीर स्वर से मोर जाग जाता हे वैसे ही "जागो" इस वाणी से वह भृगुपुत्र समाधि स…
- Verse 26उसने आँखें खोलकर समीप में आये हुए एक साथ उदित हुए सूर्य ओर चन्द्रमा तुल्य काल ओर भृगु को…
- Verse 27कदम्ब लता के आसन से उठकर उसने एक साथ आये हुए, विप्रवेषधारी विष्णु शिव के तुल्य समान कान्त…
- Verse 28तत्कालोचित परस्पर अभिनन्दन आदि व्यवहार कर लेने पर वे लोग शिला पर सुमेरु पीठ पर जगत्पूज्य…
- Verse 29तदनन्तर हे श्रीरामचन्द्रजी, समंगा के तट मेँ समाधि से विरत उस ब्राह्मण ने इन दोनों से (काल…
- Verse 30हे भगवन्, इस लोक मेँ एक साथ आये हुए चन्द्रमा और सूर्य के समान आप लोगों के दर्शन से आज मै…
- Verse 31जो मनोमोह शारत्राभ्यास, तपश्चर्या, उपासना तथा ब्रह्मज्ञान से नष्ट नहीं हुआ था, वह मेरा मन…
- Verse 32निर्मल अमृत की वृष्टि अन्तरात्मा को वैसा सुखी नहीं बनाती है जैसा कि आप महात्माओं की केवल…
- Verse 33हे भगवन्, आकाश को चन्द्रमा और सूर्य के तुल्य इस हमारे देश को अपने चरणों से पवित्र बनानेव…
- Verse 34हे श्रीरामचन्द्रजी, शुक्र के यह कहने पर भृगुजी ने जन्मान्तर के अपने पुत्र से कहा : तुम अप…
- Verses 35–36भृगुजी द्वारा बोध को प्राप्त हुए उसने ध्यान से दिव्य चक्षु खोलकर क्षणभर अपनी जन्मान्तर की…
- Verses 37–38तदनन्तर वक्ताओं में श्रेष्ठ उसने आश्चर्य के दर्शन से विकसित मुख होकर वितर्कं से मन्द वचन…
- Verse 39आदि भी बीत गये हैं ॥ ३ ८॥ मैंने कठिन क्रोध और उद्योग से भरे हुए राजाओं को देखा, धनोपार्जन…
- Verse 40सुमेरुपर्वत के समीप की भूमियों में मन्दार के फूलों के केसरों से रंजित अतएव सुगन्धपूर्ण तथ…
- Verse 41फूली हुई सुवर्णलताओं की पंक्तियों से पूर्णं मन्दराचल के निकुजो में मैंने भ्रमण किया
- Verse 42ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जिसका मैंने भोग न किया हो, ऐसी कोई क्रिया नहीं है, जो मैंने नहीं क…
- Verse 43एक आत्मा के साक्षात्कार से भी सबका ज्ञान दशति है। इस समय जानने योग्य सारी बातें मैंने जान…
- Verse 44हे पिताजी, उठिये चलें, सूखी हुई वनलता की नाई सूखे हुए मन्दराचल पर स्थित उस शरीर को देखें
- Verse 45यदि शंका हो कि उस शरीर से तुम्हें क्या करना है ? तो इस पर कहते हैं। इस संसार में न तो मेर…
- Verse 46यदि कोई शंका करे कि नियति की रचना देखने के लिए विहार करते हुए आपकी उसमें आसक्ति होने से प…