Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 14, Verses 35–36
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 14, verses 35–36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
प्रबोधितोऽसौ भृगुणा जन्मान्तरदशां निजाम् ।
मुहूर्तमात्रं सस्मार ध्यानोन्मीलितलोचनः ॥ ३५ ॥
अथासौ विस्मयात्स्मेरमुखो मुदितमानसः ।
वितर्कमन्थरां वाचमुवाच वदतां वरः ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
भृगुजी द्वारा बोध को प्राप्त हुए उसने ध्यान से
दिव्य चक्षु खोलकर क्षणभर अपनी जन्मान्तर की अवस्था का स्मरण किया