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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 14, Verses 37–38

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 14, verses 37–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

जगत्यविदितारम्भा नियतिः परमात्मनः । यद्वशादिदमाभोगि जगच्चक्रं प्रवर्तते ॥ ३७ ॥ ममानन्तान्यतीतानि जन्मान्यविदितान्यपि । दशाफलान्यनन्तानि कल्पान्तकलितादिव ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर वक्ताओं में श्रेष्ठ उसने आश्चर्य के दर्शन से विकसित मुख होकर वितर्कं से मन्द वचन कहा उस समय उसका मन अत्यन्त प्रसन्न था ॥३ ६॥ इस संसार में कर्मफल का नियन्त्रण करनेवाली परमात्मा की मायाशक्ति का व्यापार किसी को ज्ञात नहीं है जिसके कारण यह विशाल जगद्रूपी चक्र चल रहा है