Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 14, Verses 2–3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 14, verses 2–3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 2, 3
संस्कृत श्लोक
तौ शैलादवरोहन्तौ दृष्टवन्तौ महाद्युती ।
नवहैमलताजालकुञ्जसुप्तनभश्चरान् ॥ २ ॥
वल्लीवलयदोलाभिः क्रीडतो गगनाङ्गणे ।
हरिणीमुग्धमुग्धाक्षिप्रेक्षितस्मारितोत्पलान् ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
पर्वत से उतर
रहे उन दोनों महातेजस्वियों ने अभिनव, सुवर्णमयी लताओं के समूहों के निकुजों में सोये हुए देवताओं
और पक्षियों को देखा जो गगनांगण में लताओं से वेष्टित झूलों के द्वारा क्रीड़ा कर रहे थे। वे हरिणियों
के तुल्य मनोहर अपने कटाक्षों से कमल का स्मरण करा रहे थे