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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 14, Verse 46

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 14, verse 46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 46

संस्कृत श्लोक

यदतिसुभगमार्यसेवितं तत्स्थिरमनुयामि यदेकभावबुद्ध्या । तदलमभिमता मतिर्ममास्तु प्रकृतमिमं व्यवहारमाचरामि ॥ ४६ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई शंका करे कि नियति की रचना देखने के लिए विहार करते हुए आपकी उसमें आसक्ति होने से पहले की तरह अप्सरा के मनोरथ द्वारा अनुगमनरूप संसार की प्राप्ति हो जायेगी ? तो इस पर दृढ़तर तत्त्वज्ञान से अज्ञानानुवृत्तिमात्र का बाध हो जाने से अब पहले की तरह अभिनिवेश की प्रसक्ति नहीं हो सकती, ऐसा कहते हैं। चूँकि मैं एकात्मता के दृढ़ निश्चय से अत्यन्त शुभालय, जीवन्मुक्त महापुरुषों से सेवित चरित्र का ही स्थिरता पूर्वक अनुसरण करता हूँ न कि मूढ़ों के चरित्रों का, इसलिए मेरी तथा आपकी अभीष्ट जो पूर्वदेह में अवस्थितिरूप बुद्धि है, वह रहे, उससे कोई भी क्षति नही होगी उस बुद्धि से बचे हुए प्रारब्ध का भोग करानेवाले व्यवहार का ही आचरण मैं करूँगा, न कि मूढ़ों की तरह आसक्ति को प्राप्त होऊँगा, यह अर्थ है