Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 111
एक सौ ढसवाँ सर्ग समाप्त एक सौ ग्यारहवाँ सर्ग यत्न से अभिमत वस्तु के तथा अहन्ता - ममता के त्याग का और चित्त पर विजय पाने के उपाय का तथा चित्त की एकाग्रता का वर्णन ।
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- Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामचन्द्रजी, मैं इस चित्त रूपी महाव्याधि की चिकित्सा की महौषधि…
- Verse 2प्रिय बाह्य विषय का परित्याग कर एकमात्र आत्माकारवृत्तिधारारूपी अपने ही पौरुष प्रयत्न से च…
- Verse 3अभिमत वस्तु त्याग रूपी पहली भूमिका को दृढ़ बनाना चाहिये, इस अभिप्राय से कहते हैं । अभिमत…
- Verse 4आत्ममात्राकार-वृत्तिधारारूपी प्रयत्न से चित्तरूपी बालक की राग, चपलता आदि रोगों के प्रतिका…
- Verses 5–7हे मननशील श्रीरामचन्द्रजी, आप चिन्तारूपी अग्नि में तपाये गये मन रूपी लोहे को शास्त्राभ्या…
- Verse 8अविरक्त लोगों की निन्दा करते है। जिसको अपने अभीष्ट वस्तु के विषय में वेराग्यवृत्ति मुश्कि…
- Verse 9अपनी वृद्धि से अरमणीय वस्तु की परम रमणीयब्रह्मरूप से भावना करके जैसे कोई बड़ा नामी पहलवान…
- Verse 10अपने पौरुष प्रयत्न से शीघ्र ही मन पर विजय प्राप्त की जा सकती है, चित्तरहित पुरुष (जिसका च…
- Verse 11जो लोग केवल अपने चित्त का निग्रह नहीं कर सकते, जो कि स्वाधीन ओर सहज साध्य है, वे पुरुषों…
- Verse 12एकमात्र अपने पौरुष से प्राप्त होने वाले अपने अभीष्ट का परित्याग रूपी मन के निग्रह मात्रके…
- Verse 13एकमात्र मन के मारण से प्राप्त होने वाले आत्मतत्त्व - साक्षात्कार से स्वराज्य सुख के विरोध…
- Verse 14अपने अभीष्ट मोक्षसुख का निवेदन करनेवाले प्रधान साधन रूप मन के निग्रह के बिना गुरुउपदेश, श…
- Verse 15श्रीराम, जब संकल्प परित्यागरूप तीक्ष्ण शस्त्र से मूल के साथ चित्त का उच्छेद हो गया, तभी प…
- Verse 16अपने संवेदन द्वारा इस संकल्परूप अनर्थ का निग्रह होने पर तदनन्तर शान्ति आदि साधनों से सम्प…
- Verse 17यदि कोई शंका करे कि दैव के प्रतिकूल होने पर कैसे कार्य सिद्धि होगी ? इस पर कहते हैं । हे…
- Verses 18–19अचित्तता की प्राप्ति में कौन उपाय है ? यह पूछने पर उसे कहते है । चित्त को बहुत काल तक उस…
- Verse 20परम पौरुष का अवलम्बन करके चित्त को अचित्त बनाकर उस महापदवी को (परब्रह्मरूपता को) प्राप्त…
- Verse 21हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे दिग्भ्रम होने पर पश्चिम दिशा में यह पूर्व दिशा है, यह संवेदनविपर…
- Verse 22चिरकाल से मन के निग्रह में लगा हुआ पुरुष उद्वेग होने से उसका परित्याग न कर बैठे, इसलिए उस…
- Verse 23राजलक्ष्मीरूप सुख देने वाले युद्ध में शस्त्रच्छेदनरूप क्लेश होता है, स्वर्गरूप खुख में भर…
- Verse 24जो नराधम अपने मन के निग्रह में भी समर्थ नहीं हैं, वे व्यवहारावस्थाओं में कैसे व्यवहार करे…
- Verses 25–26समाधि, सुषुप्ति आदि मे जन्म, मरण आदि दुखों का अनुभव नहीं होता और व्यवहारकाल में मनोवृत्ति…
- Verse 27इस लोक से मन परलोक में जाता है ओर वहाँ अन्यरूप से स्फुरित होता हे । वे मरण ओर परलोकगमन जब…
- Verse 28इस लोक में इस लोक के रूप से मन विचरण करे ओर परलोक में परलोक रूप से विचरण करे, इसलिए जब तक…
- Verse 29लोग भाई, सेवक आदि के मरने पर व्यर्थ शोक करते हैं, वह निर्विकार अपने चैतन्य से पृथग्भूत अ…
- Verses 30–33अतः परमात्मा में समूल चित्त का विनाश कर देना ही मुक्ति का उपाय है, अन्य उपाय नहीं है, ऐसा…
- Verses 34–35चित्तोपशमन के सिवा मोक्ष का दूसरा उपाय है ही नहीं, यह निश्चित है। मन के विलय का उपाय समाध…
- Verse 36अपने अधीन, अकठिन (अनायाससाध्य), अति स्वच्छ, असंकल्पन में (कल्पनाभाव में) कौन-सा भय है ? ज…
- Verses 37–39यह कल्याणकारी है, यह नहीं हे, यह बात बालकों तक में प्रसिद्ध है, इसलिए जैसे कोई विज्ञ पुरु…
- Verse 40अक्षय (जिसका नाश होना कठिन है), अनवीन (अबाल यानी अभिमानी), मनरूप सिंह को जो कि संसार की व…
- Verses 41–43मनरूपी बीज से सुख-दुःख ओर शुभ-अशुभरूपीये संसारखण्ड (संसार रूपी वन) उत्पन्न होते हें, इन व…
- Verses 44–45हे श्रीरामचन्द्रजी, आप परमात्मपदरूप सिंहासन लगाकर एकमात्र संकल्प के अभाव से सिद्ध होनेवाल…
- Verse 46हे श्रीरामचन्द्रजी, आप एकमात्र संकल्परूप अपने वैभव से, जिसने ब्रह्माण्ड आदि करोड़ों पदार्…