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Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 111

एक सौ ढसवाँ सर्ग समाप्त एक सौ ग्यारहवाँ सर्ग यत्न से अभिमत वस्तु के तथा अहन्ता - ममता के त्याग का और चित्त पर विजय पाने के उपाय का तथा चित्त की एकाग्रता का वर्णन ।

33 verse-groups

  1. Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामचन्द्रजी, मैं इस चित्त रूपी महाव्याधि की चिकित्सा की महौषधि…
  2. Verse 2प्रिय बाह्य विषय का परित्याग कर एकमात्र आत्माकारवृत्तिधारारूपी अपने ही पौरुष प्रयत्न से च…
  3. Verse 3अभिमत वस्तु त्याग रूपी पहली भूमिका को दृढ़ बनाना चाहिये, इस अभिप्राय से कहते हैं । अभिमत…
  4. Verse 4आत्ममात्राकार-वृत्तिधारारूपी प्रयत्न से चित्तरूपी बालक की राग, चपलता आदि रोगों के प्रतिका…
  5. Verses 5–7हे मननशील श्रीरामचन्द्रजी, आप चिन्तारूपी अग्नि में तपाये गये मन रूपी लोहे को शास्त्राभ्या…
  6. Verse 8अविरक्त लोगों की निन्दा करते है। जिसको अपने अभीष्ट वस्तु के विषय में वेराग्यवृत्ति मुश्कि…
  7. Verse 9अपनी वृद्धि से अरमणीय वस्तु की परम रमणीयब्रह्मरूप से भावना करके जैसे कोई बड़ा नामी पहलवान…
  8. Verse 10अपने पौरुष प्रयत्न से शीघ्र ही मन पर विजय प्राप्त की जा सकती है, चित्तरहित पुरुष (जिसका च…
  9. Verse 11जो लोग केवल अपने चित्त का निग्रह नहीं कर सकते, जो कि स्वाधीन ओर सहज साध्य है, वे पुरुषों…
  10. Verse 12एकमात्र अपने पौरुष से प्राप्त होने वाले अपने अभीष्ट का परित्याग रूपी मन के निग्रह मात्रके…
  11. Verse 13एकमात्र मन के मारण से प्राप्त होने वाले आत्मतत्त्व - साक्षात्कार से स्वराज्य सुख के विरोध…
  12. Verse 14अपने अभीष्ट मोक्षसुख का निवेदन करनेवाले प्रधान साधन रूप मन के निग्रह के बिना गुरुउपदेश, श…
  13. Verse 15श्रीराम, जब संकल्प परित्यागरूप तीक्ष्ण शस्त्र से मूल के साथ चित्त का उच्छेद हो गया, तभी प…
  14. Verse 16अपने संवेदन द्वारा इस संकल्परूप अनर्थ का निग्रह होने पर तदनन्तर शान्ति आदि साधनों से सम्प…
  15. Verse 17यदि कोई शंका करे कि दैव के प्रतिकूल होने पर कैसे कार्य सिद्धि होगी ? इस पर कहते हैं । हे…
  16. Verses 18–19अचित्तता की प्राप्ति में कौन उपाय है ? यह पूछने पर उसे कहते है । चित्त को बहुत काल तक उस…
  17. Verse 20परम पौरुष का अवलम्बन करके चित्त को अचित्त बनाकर उस महापदवी को (परब्रह्मरूपता को) प्राप्त…
  18. Verse 21हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे दिग्भ्रम होने पर पश्चिम दिशा में यह पूर्व दिशा है, यह संवेदनविपर…
  19. Verse 22चिरकाल से मन के निग्रह में लगा हुआ पुरुष उद्वेग होने से उसका परित्याग न कर बैठे, इसलिए उस…
  20. Verse 23राजलक्ष्मीरूप सुख देने वाले युद्ध में शस्त्रच्छेदनरूप क्लेश होता है, स्वर्गरूप खुख में भर…
  21. Verse 24जो नराधम अपने मन के निग्रह में भी समर्थ नहीं हैं, वे व्यवहारावस्थाओं में कैसे व्यवहार करे…
  22. Verses 25–26समाधि, सुषुप्ति आदि मे जन्म, मरण आदि दुखों का अनुभव नहीं होता और व्यवहारकाल में मनोवृत्ति…
  23. Verse 27इस लोक से मन परलोक में जाता है ओर वहाँ अन्यरूप से स्फुरित होता हे । वे मरण ओर परलोकगमन जब…
  24. Verse 28इस लोक में इस लोक के रूप से मन विचरण करे ओर परलोक में परलोक रूप से विचरण करे, इसलिए जब तक…
  25. Verse 29लोग भाई, सेवक आदि के मरने पर व्यर्थ शोक करते हैं, वह निर्विकार अपने चैतन्य से पृथग्‌भूत अ…
  26. Verses 30–33अतः परमात्मा में समूल चित्त का विनाश कर देना ही मुक्ति का उपाय है, अन्य उपाय नहीं है, ऐसा…
  27. Verses 34–35चित्तोपशमन के सिवा मोक्ष का दूसरा उपाय है ही नहीं, यह निश्चित है। मन के विलय का उपाय समाध…
  28. Verse 36अपने अधीन, अकठिन (अनायाससाध्य), अति स्वच्छ, असंकल्पन में (कल्पनाभाव में) कौन-सा भय है ? ज…
  29. Verses 37–39यह कल्याणकारी है, यह नहीं हे, यह बात बालकों तक में प्रसिद्ध है, इसलिए जैसे कोई विज्ञ पुरु…
  30. Verse 40अक्षय (जिसका नाश होना कठिन है), अनवीन (अबाल यानी अभिमानी), मनरूप सिंह को जो कि संसार की व…
  31. Verses 41–43मनरूपी बीज से सुख-दुःख ओर शुभ-अशुभरूपीये संसारखण्ड (संसार रूपी वन) उत्पन्न होते हें, इन व…
  32. Verses 44–45हे श्रीरामचन्द्रजी, आप परमात्मपदरूप सिंहासन लगाकर एकमात्र संकल्प के अभाव से सिद्ध होनेवाल…
  33. Verse 46हे श्रीरामचन्द्रजी, आप एकमात्र संकल्परूप अपने वैभव से, जिसने ब्रह्माण्ड आदि करोड़ों पदार्…