Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 111, Verse 21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 111, verse 21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 111 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
संवेदनविपर्यासरूपिणी धीरिवाचला ।
जेतुमाशु मनो राम पौरुषेणैव शक्यते ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
हे
श्रीरामचन्द्रजी, जैसे दिग्भ्रम होने पर पश्चिम दिशा में यह पूर्व दिशा है, यह संवेदनविपर्यासरूपी
बुद्धि, जो उस समय बिलकुल स्थिर रहती है, विवेक स्थिरता रूपी पुरुषप्रयत्न से जीती जा
सकती है वैसे ही मन भी पुरुषप्रयत्न से ही शीघ्र जीता जा सकता है