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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 111, Verse 28

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 111, verse 28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 111 · श्लोक 28

संस्कृत श्लोक

इहलोकेन विचरत्विहलोके परत्र च । चित्तमामोक्षमास्तेऽस्य रूपमन्यन्न विद्यते ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

इस लोक में इस लोक के रूप से मन विचरण करे ओर परलोक में परलोक रूप से विचरण करे, इसलिए जब तक मोक्ष न हो तब तक चित्त ही तत्‌-तत्‌ रूप से विद्यमान कहते है । इस संसार का चित्त से अतिरिक्त रूप नहीं हे