Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 111, Verse 14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 111, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 111 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
ईप्सितावेदनाख्यात्तु मनःप्रशमनादृते ।
गुरूपदेशशास्त्रार्थमन्त्राद्या युक्तयस्तृणम् ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
अपने अभीष्ट मोक्षसुख
का निवेदन करनेवाले प्रधान साधन रूप मन के निग्रह के बिना गुरुउपदेश, शास्त्राभ्यास,
मन्त्र आदि साधन तृण के तुल्य असार हैँ । यहाँ गुरूउपदेश, शास्त्राभ्यास आदि की निन्दामें
तात्पर्य नहीं हं, किन्तु मन के शमन की स्तुति में तात्पर्य है