Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 111, Verses 34–35
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 111, verses 34–35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 111 · श्लोक 34,35
संस्कृत श्लोक
छिन्नान्येव तदाङ्गानि चित्तस्येति मतिर्मम ।
अयं सोऽहमिदं तन्म एतावन्मात्रकं मनः ॥ ३४ ॥
तदभावनमात्रेण दात्रेणेव विलूयते ।
छिन्नाभ्रमण्डलं व्योम्नि यथा शरदि धूयते ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
चित्तोपशमन के सिवा मोक्ष का दूसरा उपाय है ही नहीं, यह निश्चित है। मन के विलय का
उपाय समाधि की परिपाकावस्था से शोधित मन में अपरोक्ष रूप से आविरभूत ब्रह्मात्मक बोध
ही है, इस आशय से कहते हैं।
सर्वश्रेष्ठ प्रमाणरूप श्रुति से बोधित सत्य सर्वव्यापक तथा मायाकलंकरहित बोध के हृदय
में उदित होने पर मन के विलयमात्र से परमशान्ति प्राप्त होती है । अत्यन्त विस्तीर्ण
दहराकाशरूपी ब्रह्मचित् में चरमवृत्ति से प्रदीप्त चित्रूपी तलवार की धारा से मन को बिना
किसी संदेह से मारो । ऐसा करने से मानसिक चिन्ता आपको बन्धन में नहीं डालेगी ॥ ३ १, ३ २॥
आपाततः रमणीय विषयों में दोषानुसंधान से अरमणीयतादरष्टि पहले करनी चाहिये, इस
आशय से कहते हैं।
यदि आपाततः रम्य-से प्रतीत होनेवाले स्त्री-पुत्र आदि को आपने अरमणीय जान लिया
तब तो चित्त के सब अंग-प्रत्यंग निश्चय ही कट गये, ऐसा मेरा विश्वास है ॥३ ३॥
काटने योग्य मन के अंग-प्रत्यंगय बतलाकर अब मन के शरीर को बतलाते हैं।
यह दिखाई दे रहा पिता द्वारा उत्पादित देह और यह देह से सम्बन्ध रखनेवाला घर, खेत
आदि, जिसका कि पहले पिता ने उपार्जन किया था, “मेरा है ऐसा जो भ्रम है, केवल यही मन
का शरीर है जैसे कोई वस्तु हँसिया से काटी जाती है वैसे ही यह मन शरीर भावना न करना
रूप शस्त्र से काटा जाता है। जैसे शरद ऋतु में आकाश में बिखरे हुए बादल के टुकड़े वायु से
उड़ाये जाते हैं वैसे ही पूर्वोक्त अहम्, मम इत्यादि कल्पना न करने से मन उड़ाया जाता है,
नष्ट किया जाता है